What is URL , Web Server, Domain, Url, Dns, Web-space Registration, Client Server Architecture, web broswer, Intetnet Protocols क्या हैं

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URL (यूनिफार्म रिसोर्स लोकेटर) क्या हैं?

URL (यूनिफार्म रिसोर्स लोकेटर)

URL का फुल फॉर्म Uniform Resource Locator होता है जो किसी website या वेबसाइट के पेज को रिप्रेजेंट करता है, या आपको किसी वेब पेज तक ले जाता है। यूआरएल इन्टरनेट में किसी भी फाइल या वेब साईट का एड्रेस होता है | URL की शुरुआत Tim Berners Lee ने 1994 में की थी |

किसी वेबसाइट का अद्वितीय नाम या पता, जिससे उसे इंटरनेट पर जाना, पहचाना और उपयोग किया जाता है, उसका URL कहा जाता है। इसे Uniform Resource Locator भी कहा जाता है। किसी वेब पते का सामान्य रूप निम्न प्रकार होता है।

यहाॅ type उस सर्वर का type बताता है, जिससे वह फाइल उपलब्ध है और Address उस साइट का पता बताता है। उदाहरण के लिये एक वेब पोर्टल के URL http://www.yahoo.com मे http सर्वर का type है और www.yahoo.com उसका पता है। जब हम किसी वेबसाइट को खोलना चाहते है तो इसका URL पते के बाक्स मे टाइप किया जाता है। यदि कोई सर्वर टाईप नही दिया जाता, तो उसे http मान लिया जाता है। हम किसी वेब पेज का पाथ उसकी वेबसाइट के यूआरएल मे जोडकर उस वेब पेज को सीधे भी खोल सकते है।

किसी वेबसाइट का पूरा URL इन सभी भागो के बीच मे डाॅट (.) लगाकर जोडने से बनता है। केवल प्रोटोकाॅल के नाम के बाद एक कोलन (:) और दो स्लेश (//) लगाये जाते है, जैसे-http://www.yahoo.com

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Parts of URL

  1. HTTP:- पहला भाग http यानि hypertext transfer protocol होता है जिसकी मदद से इटरनेट पर डाटा Transfer  होता है|
  2. Domain Name:- दूसरा भाग होता है domain name जो कि किसी particular वेबसाइट का पता (address) होता है|
  3. WWW:- यह एक सर्विस है |
  4. Yahoo:- यह संस्था का नाम है |
  5. .com :- यह डोमेन एक्सटेंशन होता है, जो यह दर्शाता है की वेबसाइट किस प्रकार की है |

Internet Protocol क्या होता है हिंदी में जानकारी

आप हमेशा सड़क पर बाएं तरफ से ही चलते है और दाएं तरफ वाली सड़क का उपयोग वापस आने के लिए करते हैं. यदि बीच में लाल बत्ती हो जाए तो आप रुक जाते है.

ये सभी यातायात के नियम है और हम सभी रोजाना इनका पालन करते हैं. यानी सड़क पर ट्रैफिक कंट्रोल करने के लिए इन्हे बनाया जाता है ताकि सुरक्षित और अबाध परिवहन होता रहे.

इसी प्रकार इंटरनेट भी सूचना का सुपर हाइवे है. जिसपर लाखों करोडों Datagram यात्रा करते रहते हैं. जिन्हे नियंत्रण करने के लिए एक जटिल और ज्यादा तेज कंट्रोल नियमों की जरूरत पड़ती है.

इन नियमों को प्रोटोकॉल कहा जाता हैं. चुंकि ये इंटरनेट पर डेटा कंट्रोल करते हैं इसलिए इनका नाम इंटरनेट प्रोटोकॉल है.

इस लेख में हम इंटरनेट प्रोटोकॉल की पूरी जानकारी दे रहे है. अध्ययन की सुविधा के लिए हमने इस लेख को निम्न भागों में विभाजित किया हैं.

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इंटरनेट प्रोटोकॉल क्या हैं – What is Internet Protocol in Hindi?

कम्प्यूटर

इंटरनेट प्रोटोकॉल

ये नियम ही डेटा का संचरण निर्धारित और शासित करने का काम करते है. इंटरनेट प्रोटोकॉल सिस्टम भारतीय डाक सेवा (Indian Postal Service) के समान ही कार्य करता है.

जब एक कम्प्यूटर(Source) से दूसरे कम्प्यूटर (Destination) में कोई डेटा भेजा जाता है तो इसे छोटे-छोटे टुकडों में बांटकर भेजा जाता है इन डुकडो को IP Packets अथवा Datagram कहा जाता है.

प्रत्येक डेटाग्राम में प्रेषक और प्राप्तकर्ता की जानकारी होती इसे IP Information कहते हैं. इंटरनेट पर प्रत्येक डेटाग्राम स्वतंत्र यात्रा करते है और मार्ग भी निर्धारित नही रहता हैं.

इंटरनेट प्रोटोकॉल केवल डिलिवर करने का काम करता है. इसका प्रेषक कम्प्यूटर (Host) और प्राप्तकर्ता (Source) कम्प्यूटर से प्रत्यक्ष जुडाव (Direct Connection) नही रहता.

डेटाग्राम का क्रम निर्धारण एक अन्य प्रोटोकॉल Transmission Control Protocol – TCP द्वारा किया जाता है. इन दोनों को सामुहिक रूप में TCP/IP कहा जाता है. TCP के अलावा UDP – User Datagram Protocol का भी उपयोग होता है.

इंटरनेट प्रोटोकॉल Internet Protocol Suite में उपलब्ध चार Communication Protocols Layers (Link Layer, Internet layer, Transport Layer, Application Layer) में से इंटरनेट लेयर का प्राथमिक प्रोटोकॉल है.

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प्रोटोकॉल के विभिन्न प्रकार – Types of Protocols in Hindi?

इंटरनेट के माध्यम से कई प्रकार का डेटा संचारित होता है. इसलिए भिन्न डेटा प्रकार के लिर भिन्न-भिन्न इंटरनेट प्रोटोकॉल्स विकसित किये गये है. जिनके द्वारा केवल विशेष प्रकार का डेटा ही संचारित किया जाता है. नीचे इंटरनेट प्रोटोकॉल के विभिन्न प्रकारों के बारे में बताया जा रहा है.

  • TCP – Transmission Control Protocol
  • FTP – File Transfer Protocol
  • HTTP – Hyper Text Transfer Protocol
  • IMAP – Instant Message Access Protocol
  • SMTP – Simple Mail transfer Protocol
  • POP – Post Office Protocol
  • SLIP – Serial Line Internet Protocol
  • PPP – Point to Point Protocol
  • SNMP – Simple Network Management Protocol
  • UDP – User Datagram Protocol
  • MIME – Multipurpose Internet Mail Extension
  • UUCP – Unix to Unix Copy Protocol
  • Gopher
  • Ethernet
  • Usenet
  • Telnet

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TCP – Transmission Control Protocol

इसका उपयोग डेटाग्राम्स को सही क्रम निर्धारण करने के लिए किया जाता है. चुंकि डेटाग्राम अलग-अलग आकार, रास्ता, समय तय करके डेस्टिनेशन तक पहुँचते है तो उन्हे प्राप्तकर्ता कम्प्यूटर में डिलिवर करने से पहले एक क्रम में जोड़ने का काम TCP करता है.

यह अपना कार्य IP के साथ मिलकर करता है, जो प्रत्येक कम्प्युटर के लिए एक विशिष्ट नाम (IP Address) निर्धारित करता है. इसलिए इसे TCP/IP भी कहते है. TCP की फुल फॉर्म Transmission Control Protocol होती है.

FTP – File Transfer Protocol

इस प्रोटोकॉल का उपयोग एक सिस्टम से दूसरे सिस्टम में फाइल ट्रासंफर करने के लिए किया जाता है. जिसके लिए एक खास सॉफ्टवेयर (जिसे क्लाईंट कहते है) का उपयोग होता है.

फाइल ट्रासंफर प्रोटोकॉल का उपयोग सबसे अधिक वेब सर्वरों पर वेबपेज अपलोड करने में होता है ताकि वेबसाइटों के जरिए इन्हे प्रकाशित किया जा सके. इसके द्वारा मल्टिमीडिया से लेकर साधारण टेक्स्ट फाइल आसानी से और तेजी गति से अपलोड-डाउनलोड की जा सकती है.

HTTP – Hyper Text Transfer Protocol

अपने ब्राउजर की एड्रेस बार पर जाए और देखिए इस लेख का एड्रेस किन शब्दों से शुरु हो रहा है? आप देखेंगे कि वहां https लिखा हुआ है और :// के सामने शेष URL लिख रहा है.

जी हां यहीं काम आता है http जिसके द्वारा वेब सर्वरों से डेटा आदान-प्रदान करने के नियम तय किये जाते है. इस प्रोटोकॉल के आधार पर वेब ब्राउजर पता लगाता है कि डेटा के साथ कैसे व्यवहार करना है?

अर्थात उसे डाउनलोड करने के लिए किन मानदण्डों का पालन करना होगा. आजकल http का सुरक्षित संस्करण https इस्तेमाल होता है जिसका पूरा नाम http Secure होता है. इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए What is URL in Hindi लेख पढिए.

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IMAP – Internet Message Access Protocol

IMAP एक Standard Email Protocol है जो ईमेल्स को मेल सर्वर पर स्टोर करता है. मगर प्राप्तकर्ता को उसे पढने और संपादित करने की वहीं सुविधा मुहैया कराता है. जैसे मैसेज उसके डिवाइस में ही मौजूद हो.

यह प्रोटोकॉल रिमोट मेल सर्वर की तरह कार्य करता है. IMAP की फुल फॉर्म Internet Message Access Protocol होती है. इसे कुछ Instant Message Access Protocol भी कहते है जो गलत है. इसलिए इस बात का ध्यान अवश्य रखें.

SMTP – Simple Mail Transfer Protocol

SMTP एक लोकप्रिय ईमेल प्रोटोकॉल है जिसका उपयोग ईमेल भेजने के लिए किया जाता है. इस प्रोटोकॉल का उपयोग IMAP से भी ज्यादा होता है. इस प्रोटोकॉल के द्वारा एक कम्प्यूटर से दूसरे कम्प्यूटर पर ईमेल भेजने के लिए नियमों का निर्धारण होता है. जिनके आधार पर ही ईमेल्स भेजे जाते है.

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POP – Post Office Protocol

POP का उपयोग ईमेल प्राप्त करने के लिए किया जाता है. इस प्रोटोकॉल का POP3 यानी तीसरा संस्करण प्रचलन में है. जो ईमेल प्राप्त करने का एक मानक प्रोटोकॉल बन चुका है.

SLIP – Serial Line Internet Protocol

यह प्रोटोकॉल दो डिवाइसों के बीच संचार करने का प्रोटोकॉल है. इन डिवाइसों को आपस में एक दूसरे से कंफिगर किया जाता है. इसके बाद ही ये एक-दूसरे से कम्युनिकेट कर पाते है.

यह एक धीमा और कम सुरक्षित प्रोटोकॉल है जिसका उपयोग बहुत ही कम होता है. यह TCP/IP का ही एक रूप है. SLIP का पूरा नाम Serial Line Internet Protocol होता है.

PPP – Point to Point Protocol

 इस प्रोटोकॉल का उपयोग Point-to-Point Links पर बहुप्रोटोकॉल डेटा ट्रांसफर करने के लिए किया जाता है. यानी आप इस प्रोटोकॉल के माध्यम से अलग-अलग प्रकार के प्रोटोकॉलों का डेटा ट्रांसफर कर सकते है.

यह भी प्रचलन से बाहर सा हो चुका है. मगर अभी भी कहीं-कहीं DSL (Digital Subscriber Line) और मॉडेम को जोडने के लिए इस्तेमाल होता है.

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SNMP – Simple Network Management Protocol

SNMP की फुल फॉर्म Simple Network Management Protocol होती है. यह नेटवर्क्स लोकल एरिया नेटवर्क और वाईड ऐरिया नेटवर्क से कनेक्ट डिवाइसों का प्रबंध और मॉनिटर करने के लिए उपयोग होता है.

इसे लगभग नेटवर्क मे शामिल सभी हार्डवेयर उपकरणों, रूटर, स्वीच्स, वायरलेस एक्सेस पॉइट, गेटवे आदि द्वारा सपोर्ट किया जाता है और इसके अंतिम पॉइंट से कनेक्टेड प्रिंटर्स, स्कैनर् भी इसे समझते है.

SNMP नेटवर्क के चार प्रमुख भाग होते है:

  • SNMP Agent
  • SNMP Managed Devices and Resources
  • SNMP Manager
  • Management Information Base

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UDP – User Datagram Protocol

UDP का इस्तेमाल भी TCP की तरह ही किया जाता है. इसके द्वारा Low-Latency तथा Loss-Tolerating कनेक्शन बनाए जाते है. यह इंटरनेट प्रोटोकॉल के ऊपर काम करते है. इसलिए इसे सामुहिक रूप में UDP/IP भी कहते है. UDP की फुल फॉर्म User Datagram Protocol होती है.

MIME – Multipurpose Internet Mail Extension

MIME मूलभूत ईमेल प्रोटोकॉल का विस्तार है जिसका उपयोग इंटरनेट के माध्यम से विभिन्न प्रकार की फाइल्स का आदान-प्रदान करने के लिए होता है.

ये फाइल्स ओडियो, विडियो, डॉक्युमेंट्स, ग्राफिक्स, एप्लिकेशन प्रोग्राम तथा साधारण ASCII Text Files होती है. MIME का उल्लेख RFC 1521-22 में विस्तार से किया गया है. MIME की फुल फॉर्म Multipurpose Internet Mail Extension होती है.

UUCP – UNIX to UNIX Copy Protocol

UUCP UNIX Programs का एक ऐसा सेट है जिसके द्वारा एक युनिक्स सिस्टम से दूसरे युनिक्स सिस्टम में फाइल्स प्रेषित की जाती है. साथ ही कमांड्स भी भेजी जाती है जो उस सिस्टम पर जाकर एक्जिक्यूट की जा सकती हैं. UUCP की फुल फॉर्म UNIX to UNIX Copy Protocol होती है.

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Gopher

गोफर एक ऐसा प्रोग्राम होता है जो युजर को दुनियाभर की जानकरी Hierarchically रूप में प्रस्तुत करता है. युजर अपने हिसाब से कोई भी टॉपिक पसंद कर सकता है और हाईपरलिंक के माध्यम से उसे अपने कम्प्यूटर सिस्टम में एक्सेस कर सकता है.

इस प्रोगाम को University of Minnesota द्वारा विकसित किया गया था, जिसका नामकरण इस विश्वविद्यालय की खेल टीम के नाम “Golden Gopher” के आधार पर किया गया.

यह सिस्टम आज के WWW के समान ही था. मगर इसके विकास के साथ ही गोफर का प्रचलन बंद सा हो गया. गोफर ब्राउजर तथा फाइल टेक्स्ट पर आधारित होती थी. आज गोफर का सारा कंटेट वेब से प्राप्त किया जा सकता है.

Ethernet

इथरनेट वह परपंरागत तकनीक है जिसके द्वारा तारवाले (Wired) लोकल ऐरिया नेटवर्क पर डिवाइसों को जोडा जाता है. यह प्रोटोकॉल तय करता है कि नेटवर्क पर डिवाइस एक-दूसरे से किस प्रकार कम्युनिकेट करेंगे ताकि अन्य डिवाइस डेटा को पहचान सके, प्राप्त कर सके और प्रोसेस कर सके. यह केबल भौतिक होती है अथवा इनका अस्तित्व होता है जिनके भीतर डेटा ट्रांसफर होता है.

Usenet

Usenet, इसे न्युज भी कहते है, एक न्युज प्रोटोकॉल है जिसका उपयोग न्युज और ऑनलाइन फॉर्म्स पर किया जाता है. इसके लिए NNTP – Network News Transfer Protocol का इस्तेमाल होता है. जिसके जरिए वेबफॉर्म्स तथा कंपनिज फॉर्म को कंट्रोल किया जाता है.

यूजनेट कई भागों में विभाजित रहता है. प्रत्येक भाग अलग-अलग विषय पर चर्चा को कंट्रोल करने का काम करता है. जैसे; sci. विज्ञान से जुडे हुए विषयों पर चर्चाओं को देखता है.

Telnet

वर्चुअल कम्प्यूटरों को मैनेज करने के लिए इस्तेमाल होने वाला प्रोटोकॉल है टेलनेट. इसके द्वारा रिमोट कम्प्यूटर पर कार्य करने की सुविधा मुहैया कराई जाती है. ताकि एक युजर रिमोट सिस्टम पर लोकल सिस्टम की भांति कार्य कर सके.


आपने क्या सीखा?

इस लेख में हमने आपको इंटरनेट प्रोटोकॉल के बारे में पूरी जानकारी दी है. आपने जाना कि इंटरनेट प्रोटोकॉल क्या होता है. प्रोटोकॉल के विभिन्न प्रकार. साथ में IPv4 एवं IPv6 को भी समझा है. हमे उम्मीद है कि यह लेख आपके लिए उपयोगी साबित होगा.

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Domain name

डोमेन नाम वेबसाइट के उद्येश्य को पहचानता है। उदाहणार्थ, यहाॅ .com डोमेन नाम बताता है कि यह एक व्यापारिक साइट है। इसी प्रकार लाभ न कमाने वाले संगठन .org तथा स्कूल तथा विश्वविद्यालय आदि .edu  डोमेन नामो का उपयोग करते है। सामान्यत: निम्न 6 प्रकार के डोमेन यूज किये जाते है |

  • .Com – Commercial Website (व्यापारिक संस्थान के लिए)
  • .Edu – Education Website (शैक्षणिक संस्थान के लिए)
  • .Gov – Government Website (शासकीय संस्थान के लिए)
  • .Mil – Millitry Website (मिलिट्री संस्थान के लिए)
  • .Org – Organisation Website (संगठन संस्थान के लिए)

URL कैसे काम करता है ?

इन्टरनेट पर हर वेबसाइट का एक IP Address होता है जो  numerical होता है जैसे www.google.com का IP एड्रेस  64.233.167.99 हैं तो जैसे ही हम अपने ब्राउज़र में  किसी वेबसाइट का URL टाइप करते हैं तब हमारा browser उस url को DNS की मदद से उस डोमेन के IP address में बदल देता है। और उस वेबसाइट तक पहुच जाता है जो हमने सर्च की थी । शुरुवात में direct IP से ही किसी वेबसाइट को एक्सेस किया जाता था लेकिन यह एक बहुत कठिन तरीका था । क्योंकि इतने लम्बे  नबर को तो कोई याद रख पाना बहुत मुश्किल था । इसलिये बाद में DNS (domain name system) नाम बनाये गए जिस से हम किसी वेबसाइट का नाम आसानी से याद रखा जा सकता है

डोमेन नाम क्या हैं?

डोमेन नाम क्या हैं? (What is Domain Name?)

डोमेन नाम आपकी वेबसाइट का नाम है। डोमेन नाम वह पता है जहां इंटरनेट यूजर आपकी वेबसाइट तक पहुंच सकते हैं। इंटरनेट पर वेबसाइट खोजने और पहचानने के लिए डोमेन नाम का उपयोग किया जाता है। कंप्यूटर IP address का उपयोग करते हैं, जो संख्या की एक श्रृंखला है। डोमेन नाम अक्षरों और संख्याओं का कोई भी संयोजन हो सकता है, और इसका उपयोग विभिन्न डोमेन नाम एक्सटेंशन, जैसे .com, .net आदि में किया जाता है।

उपयोग करने से पहले डोमेन नाम पंजीकृत होना चाहिए। प्रत्येक डोमेन नाम यूनिक होता है। हर वेबसाइट का डोमेन नाम अलग अलग होता हैं दो वेबसाइट का डोमेन नाम एक जैसा नहीं होता हैं यदि कोई www.Computerhindinotes.com टाइप करता है, तो यह आपकी वेबसाइट पर जाएगा किसी और वेबसाइट पर नहीं।

डोमेन नाम दुनिया भर में उपयोग किए जाते हैं, विशेष रूप से नेटवर्क और डेटा संचार की दुनिया में। निम्नलिखित बिंदु बताते हैं कि वे कैसे काम करते हैं और उनका उपयोग कैसे किया जाता है:

  • डोमेन नाम के दो भाग होते हैं जिन्हें एक डॉट द्वारा अलग किया जाता है, जैसे example.com।
  • डोमेन नाम सिंगल आईपी एड्रेस या आईपी एड्रेस के समूह की पहचान करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • एक होस्ट या संगठन वैकल्पिक नाम के रूप में डोमेन नाम का उपयोग कर सकते हैं क्योंकि डोमेन नाम अल्फ़ान्यूमेरिक (सभी संख्याओं के विपरीत) हैं, जिससे उन्हें याद रखना आसान हो जाता है।
  • किसी वेबसाइट की पहचान करने के लिए URL के हिस्से के रूप में डोमेन नाम का उपयोग किया जाता है।
  • डॉट का अनुसरण करने वाला हिस्सा Top level Domain (TLD) या समूह है, जिसका डोमेन नाम उदाहरण के लिए, .gov अमेरिकी सरकार के डोमेन के लिए TLD है।

आपको एक डोमेन नाम की आवश्यकता क्यों है (Why do you need a domain name)

इंटरनेट पर, आपका डोमेन नाम आपकी वेबसाइट की विशिष्ट पहचान है। किसी भी व्यक्ति, व्यवसाय या संगठन को इंटरनेट उपस्थिति की योजना बनाकर डोमेन नाम में निवेश करना चाहिए। अपना स्वयं का डोमेन नाम, वेबसाइट और ईमेल पते होने से आपको और आपके व्यवसाय को प्रोफेशनल रूप मिलता हैं। व्यवसाय के लिए डोमेन नाम पंजीकृत करने का एक और कारण कॉपीराइट और ट्रेडमार्क की रक्षा करना, साख बनाना, ब्रांड जागरूकता बढ़ाना और सर्च इंजन स्थिति बनाना है।

डोमेन नाम वेबसाइट के उद्येश्य को पहचानता है। उदाहणार्थ, यहाँ .com डोमेन नाम बताता है कि यह एक व्यापारिक साइट है। इसी प्रकार लाभ न कमाने वाले संगठन .org तथा स्कूल तथा विश्वविद्यालय आदि .edu  डोमेन नामो का उपयोग करते है। नीचे दी गई सूची मे URL मे सामान्यतया प्रयोग किये जाने वाले डोमेन नाम और उनका पूरा नाम बताया गया है।

Abbreviation (Extensions)Full Forms
.comCommercial Internet Sites
.netInternet Administrative Site
.orgOrganization Site
.eduEducation Sites
.firmBusiness Site
.govGovernment Site
.intInternational Institutions
.milMilitary Site
.mobiMobile Phone Site
.intInternational Organizations site
.ioIndian Ocean (British Indian Ocean Territory)
.milU.S. Military site
.govGovernment site
.storeA Retail Business site
.webInternet site
.inIndia
.auAustralia
.aeArab Emirates
.saSaudi Arabia
.usUnited States
.ukUnited Kingdom
.khCambodia
.thThailand
.cnChina
.vnVietnam
.jpJapan
.sgSingapore
.nzNew Zealand
.myMalaysia

डोमेन नाम पंजीकरण (Domain Name Registration)

आप डोमेन नाम के रूप में किसी शब्द या वाक्यांश का उपयोग कर सकते हैं। यदि डोमेन किसी कंपनी के लिए है, तो आप अपनी कंपनी का नाम डोमेन में रख सकते हैं, इससे आपके ग्राहकों के लिए आपको इंटरनेट पर ढूंढना आसान हो जाता है।

यद्यपि एक लंबा डोमेन याद रखना कठिन है, इसमें अधिक कीवर्ड शामिल हो सकते हैं, जो महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ खोज इंजन किसी डोमेन नाम में कीवर्ड का उपयोग खोज एल्गोरिदम के हिस्से के रूप में करते हैं। लेकिन उन डोमेन नामों से सावधान रहें जो बहुत लंबे हैं|

वेबसाइट तैयार करने के बाद इंटरनेट पर इसकी उपस्थिति को सुनिश्चित करने के लिए साइट को अपने डोमेन नेम की आवश्यकता होती है। यूजर इस डोमेन के नाम का प्रयोग कर इंटरनेट पर आपके द्वारा उपलब्ध उत्पादों तथा सेवाओं को ढूंढने के लिए करते हैं। उदाहरण के तौर पर https://computerhindinotes.com पर आप हमारे द्वारं बनाये गए हिंदी नोट्स प्राप्त कर सकते हैं।

डोमेन के नाम का रजिस्ट्रेशन हम कई विभिन्न कंपनियों के द्वारा करवा सकते हैं। ऐसी कंपनियां जो डोमेन के नाम का रजिस्ट्रेशन करवाती हैं उन्हें ‘डोमेन रजिस्ट्रार’ कहा जाता है। डोमेन के नाम का रजिस्ट्रेशन मुख्य रूप से वही कंपनियां अपने माध्यम से करवाती हैं जिनके होस्ट सर्वर पर आप अपना वेबसाइट अपलोड करते हैं। पर पिछले कुछ समय में इस व्यवस्था में बदलाव हुआ है, अब डोमेन रजिस्टर और वेब स्पेस खरीदने के लिए आप अलग अलग कंपनी को चुन सकते हैं|

USEFUL LINKS

कुछ लोकप्रिय डोमेन रजिस्ट्रार के नाम निम्नलिखित है।

  • Google
  • GoDaddy
  • NameCheap
  • ResellerClub
  • Netfirms

इनके आलावा भी लाखों ऐसी कंपनी है जिनसे आप अपना डोमेन रजिस्टर करवा सकते हैं |

जब हम किसी डोमेन रजिस्ट्रार की सहायता से अपना डोमेन रजिस्टर कराते हैं तो वह हमें एक निश्चित राशि के बदले में डोमेन कंट्रोल पैनल और उसका यूजर नेम, पासवर्ड उपलब्ध कराता है। इस यूजर नेम और पासवर्ड की सहायता से हम डोमेन कंट्रोल पैनल में login करके वेब स्पेस प्रोवाइडर द्वारा दिए गए Name Server को डोमेन के साथ लिंक कर सकते हैं। वेबसाइट को चालू करने के लिए यह एक अति  महत्वपूर्ण कार्य होता है |

वेब-स्पेस पंजीकरण (Web-space Registration)

आजकल कई कंपनियां अपने वेब सर्वर पर यूजर की साइट के लिए स्थान उपलब्ध कराती हैं जो कंपनी सर्वर पर स्थान उपलब्ध करते हैं उन्हें ‘होस्ट सर्वर’ कहते हैं, ये कंपनी कई तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं जैसे कि सॉफ्टवेयर तकनीकी सहयोग इत्यादि। एक बार जब आप अपने डोमेन के लिए वेब स्पेस का रजिस्ट्रेशन करा लेते हैं तो उसके पश्चात आप अपनी साइट की फाइलों को FTP या होस्टिंग कण्ट्रोल पैनल की सहायता से अपलोड कर सकते हैं, इसके बाद ही इन्टरनेट के माध्यम से यूजर आपकी साइट को एक्सेस कर सकते हैं|

कुछ कंपनी जो अपने सर्वर पर स्थान उपलब्ध कराती हैं वह निम्नलिखित हैं

  • GoDaddy
  • Bigrock
  • BlueHost
  • HostGatorcds
  • CyberDairy Solutions

जब हम किसी भी होस्टिंग प्रोवाइडर से अपनी वेबसाइट के लिए स्पेस खरीदते हैं तो हमें एक होस्टिंग  कंट्रोल पैनल मिलता है जिसकी सहायता से हम अपनी साइड के कंटेंट को कंट्रोल कर सकते हैं।

कुछ लोकप्रिय कण्ट्रोल पैनल के नाम निम्नलिखित हैं|

  • cPanel
  • Plesk
  • Webmin
  • zPanel

वेब सर्वर क्या होता है

Web Server

Web Server एक ऐसा प्रोग्राम होता है जो वेबपेज सर्व करता है, अर्थात वह सॉफ्टवेयर जो वेब पेजों को यूजर तक पहुंचाता है वेब सर्वर कहलाता है । इसे दो भागों में बांटा जा सकता है, पहला वह मशीन जिस पर वेब सर्वर को स्थापित किया जाता है और दूसरा सॉफ्टवेयर जो वेब सर्वर की तरह काम करता है। सामान्यतया वेब पेज HTTP प्रोटोकॉल द्वारा यूजर तक पहुंचाये जाते है। यूजर किसी भी कंप्यूटर में वेब सर्वर सॉफ्टवेयर को इनस्टॉल करके एवं उसे इंटरनेट से जोड़ कर, इन्टरनेट पर वेब पेज प्रोवाइड करने वाले वेब सर्वर में बदल सकता हैं। यूजर इन्टरनेट पर जो भी वेब पेज देखता है वे उनके कंप्यूटर पर किसी ना किसी वेब सर्वर के द्वारा ही पहुंचाये जाते हैं। यदि यूजर अपने कंप्यूटर पर केवल सॉफ्टवेयर इनस्टॉल करें और उसे इंटरनेट से कनेक्ट ना करे तो भी यह वेब सर्वर कहलायगा लेकिन यह सर्वर लोकल लेवल पर ही यूजर के किये कार्य करेगा |

एक कम्‍प्‍यूटर जो web page को भेजता (deliver) है, वेब सर्वर (Web Server) कहलाता है। प्रत्‍येक वेब सर्वर का एक IP एड्रेस होता है तथा एक डॉमेन नेम होता है। उदाहरण के लिए, यदि आप अपने ब्राउजर में http://www.compterhindinotes.com/index.html नामक URL इंटर करते हैं, तो यह सर्वर को रिक्वेस्ट भेजता है जिसका डोमेन नेम compterhindinotes.com है,तब सर्वर index.html नामक page को निकालता है तथा आपके ब्राउजर को भेज देता है।

कोई भी कम्‍प्‍यूटर, वेब सर्वर में परिवर्तित हो जाता है, जबकि उसमें सर्वर सॉफ्टवेयर इन्‍स्‍टॉल हो तथा वह internet से कनेक्‍ट (connect) हो। ऐसी बहुत सी वेब सर्वर ऐप्‍लीकेशन्‍स हैं जो NCSA एवं Apache के पब्लिक डॉमेन सॉफ्टवेयर रखती हैं तथा माइक्रोसॉफ्ट के व्‍यवसायिक पैकेजेज़, Netscape एवं अन्‍य और भी हैं।

Features of Web-Server

  • HTTP : HTTP यानी Hyper Text Transfer Protocol एक एप्लीकेशन protocol है जिसका इस्तेमाल इन्टरनेट के जरिये hyper media या hyper text भेजने के लिए किया जाता है। इसके जरिये client browser एप्लीकेशन के द्वारा server से डाटा को ट्रान्सफर कर पाते है। HTTP protocol के कारण ही client और server के बीच connection बन पाता है। HTTP protocol का इस्तेमाल करके ही हम वर्ल्ड वाइड वेब के जरिये डाटा भेज पाते है।हम इन्टरनेट के जरिये जितनी websites और डाटा खोलते है या download करते है वो सभी HTTP कीवजह से ही संभव हो पता है। HTTP वर्ल्ड वाइड web का आधार (base) है| HTTP डाटा ट्रान्सफर करने के लिए port 80 का इस्तेमाल करता है। HTTP अधिकतर इस्तेमाल होने वाले protocols में से एक जिसका इस्तेमाल करके हम आजकल technology की सबसे अनोखी देन इन्टरनेट का इस्तेमाल कर पाते हैं HTTP protocol HTTPS protocol का base है इसलिए HTTPS का इसके बिना कोई अस्तित्व नहीं।प्रत्‍येक वेब सर्वर प्रोग्राम client से HTTP रिक्वेस्ट प्राप्‍त करके ऑपरेट होता है तथा client को एक HTTP रिस्पांस उपलब्‍ध कराता है।एक (response) सामान्‍यत: एक HTML या XHTML डॉक्‍यूमेंट को रखता है तथापि एक raw file,एक इमेज या कुछ अन्‍य प्रकार का डॉक्‍यूमेंट्स (MJME – प्रकार द्वारा परिभाषित) हो सकता है। यदि client request में कुछ error प्राप्‍त होती है, तब वेब सर्वर एक त्रुटि जवाब भेजता है, जो कुछ कस्‍टम HTML या टैक्‍स्‍ट मैसेज रखता है। ये समस्‍या को अंतिम (end) यूजर के लिए उचित प्रकार से व्‍याख्‍या करते हैं।
  • लॉगिन (Logging) : वेब सर्वर में, client requests तथा लॉग फाइल्‍स के लिए सर्वर रेस्‍पॉन्‍स के बारे में विस्‍तृत जानकारी को लॉगिंग करने की भी क्षमता होती है। यह वेब मास्‍टर को इन फाइल्‍स पर लॉग एनॉलाइजर (Log analyzer) चलाकर डाटा कलेक्ट करने की परमीशन देता है।

कई वेब सर्वर  निम्‍नलिखित विशेषताँए भी एक्सीक्यूट करते हैं :

  1. Authentication : कुछ या सभी रिसोर्सेज को एक्सेस करने से पहले Authentication के लिए अतिरिक्‍त ऑथराईजेशन रिक्वेस्ट (Authorization request) की जाती है- जैसे (यूजर नेम और पासवर्ड)
  2. Handling : एक या एक से अधिक रिलेटिड इंटरफेस (SSI, CGI, SCGI, FastCGI, JSP, ColdFusion, PHP, ASP, ASP.NET, Server API जैसे – NSAPI, ISAPI, इत्‍यादि) के सपोर्ट द्वारा static contents तथा dynamic contents की हैंडलिंग करता है ।
  3. Security : HTTPS, सामान्‍य पोर्ट 80 के स्‍थान पर स्‍टैंडर्ड पोर्ट 443 पर सुरक्षित (secure or encrypted) कनेक्‍शन्‍स की परमीशन को सपोर्ट करता है।
  4. Content compression: रेस्‍पॉन्‍स के साइज़ को घटाता है।
  5. Virtual Hosting : एक IP एड्रेस के निर्माण द्वारा कई वेब साईट्स को सर्व करना।
  6. Large File Support : 32 बिट OS पर 2GB से अधिक आकार वाली फाइल्‍स को सर्व करने योग्‍य बनाना।
  7. Bandwidth throttling : रेस्‍पॉन्‍स की स्पीड को सीमित करना ताकि नेटवर्क संतृप्‍त (saturated) न हो और अधिक क्‍लाइन्‍ट को सर्व करने में सक्षम रहे।

क्लाइंट सर्वर आर्किटेक्चर क्या हैं?

What is Client Server Architecture (क्लाइंट सर्वर आर्किटेक्चर क्या हैं)

क्लाइंट-सर्वर आर्किटेक्चर (क्लाइंट / सर्वर) एक नेटवर्क आर्किटेक्चर है जिसमें नेटवर्क पर प्रत्येक कंप्यूटर या तो क्लाइंट या सर्वर होता है। जिसमें सर्वर क्लाइंट द्वारा उपभोग किए जाने वाले अधिकांश संसाधनों और सेवाओं को होस्ट करता है, वितरित करता है और प्रबंधित करता है। इस प्रकार के आर्किटेक्चर में नेटवर्क या इंटरनेट कनेक्शन पर केंद्रीय सर्वर से जुड़े एक या अधिक क्लाइंट कंप्यूटर होते हैं। 

क्लाइंट / सर्वर आर्किटेक्चर को नेटवर्किंग कंप्यूटिंग मॉडल या क्लाइंट / सर्वर नेटवर्क के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि सभी अनुरोध और सेवाएं नेटवर्क पर वितरित की जाती हैं। सर्वर कंप्यूटर या डिस्क ड्राइव (फ़ाइल सर्वर), प्रिंटर (प्रिंट सर्वर), या नेटवर्क यातायात (नेटवर्क सर्वर) के प्रबंधन के लिए समर्पित प्रक्रियाएं हैं। क्लाइंट पीसी या वर्कस्टेशन हैं जिन पर उपयोगकर्ता एप्लिकेशन चलाते हैं। क्लाइंट संसाधनों के लिए सर्वर पर भरोसा करते हैं, जैसे फाइल, डिवाइस और यहां तक ​​कि प्रोसेसिंग पावर।

जहाॅ पर कम्प्यूटरो की संख्या अधिक होती हैं इस प्रकार के वातावरण के लिये क्लाइंट सर्वर आर्किटेक्चर को तैयार किया गया था। उदाहणार्थ, बहुत सारे कम्प्यूटरो को आपस मे नेटवर्क तकनीक के द्वारा जोड दिये जाते है। इनमे किसी एक कम्प्यूटर को Workstation बना दिया जाता है। Server पर इन सभी कम्प्यूटरो की फाइले सेव होती है इस माडॅल को Client Server माॅडल कहते है। इस माॅडल मे एक या एक से अधिक कम्प्यूूटर क्लाइंट होते है तथा Server एक होता है। इस माॅडल मे क्लाइंट अपनी रिक्वेस्ट नेटर्वक के द्वारा सर्वर पर भेजता है तथा Server उस रिक्वेस्ट को Response करता है। इस तरह का नेटर्वक संसाधनो का साझा उपयोग करने मे मदद करता है। इस तरह के माॅडल मे हम हार्डवेयर तथा साॅफ्टवेयर को Share  कर सकते है। उदाहरणतः प्रिटंर को Server से Connect कर देते है तो फिर किसी भी वर्कस्टेशन से किसी भी फाइल का प्रिटंआउट निकाल सकते है।

क्लाइंट प्रक्रिया (Client Process)

क्लाइंट एक कंप्यूटर सिस्टम हैं जो किसी तरह के नेटवर्क के जरिय अन्य कंप्यूटरों पर सर्विस एक्सेज करता है क्लाइंट एक ऐसी प्रक्रिया है जो सर्वर को संदेश भेजता है और सर्वर उस कार्य को पूरा करता है। क्लाइंट प्रोग्राम आमतौर पर एप्लिकेशन के User interface हिस्से का प्रबंधन करते हैं, क्लाइंट-आधारित प्रक्रिया उस एप्लिकेशन का फ्रंट-एंड है जिसे उपयोगकर्ता देखता है और उससे संपर्क करता है। क्लाइंट प्रक्रिया स्थानीय संसाधनों का प्रबंधन भी करती है जो उपयोगकर्ता मॉनीटर, कीबोर्ड, वर्कस्टेशन सीपीयू जैसे इंटरैक्ट करता है। क्लाइंट वर्कस्टेशन के प्रमुख तत्वों में से एक ग्राफिकल यूजर इंटरफेस (जीयूआई) है।

सर्वर प्रक्रिया (Server Process)

क्लाइंट सर्वर आर्किटेक्चर मे, सर्वर प्रोसेस एक ऐसा प्रोग्राम है, जो क्लाइंट द्वारा रिक्वेस्ट किये गये कार्य को पूरा करता है। आमतौर पर सर्वर प्रोग्राम क्लाइंट प्रोग्राम से रिक्वेस्ट प्राप्त करता है तथा क्लाइंट को Response करता है। सर्वर आधारित प्रोसेस नेटर्वक की दूसरी मशीन पर भी चल सकता है। यह सर्वर हाॅस्ट आॅपरेटिंग सिस्टम या नेटर्वक फाइल सर्वर हो सकता है। सर्वर को फिर File System सेवाएं तथा एप्लीकेशन प्रदान किया जाता है तथा कुछ स्थितियो मे कोई दूसरा डेक्सटाॅप मशीन एप्लीकेशन सेवाएं प्रदान करता है।

सर्वर प्रक्रिया एक सॉफ़्टवेयर इंजन के रूप में कार्य करती है जो शेयर संसाधनों जैसे डेटाबेस, प्रिंटर, संचार लिंक या उच्च संचालित प्रोसेसर प्रबंधित करती है। सर्वर प्रक्रिया बैक-एंड कार्यों को निष्पादित करती है जो समान अनुप्रयोगों के लिए आम हैं।

क्लाइंट / सर्वर आर्किटेक्चर के उदाहरण निम्न हैं।

Two tier Architecture

Two tier Architecture वह जगह है जहां कोई क्लाइंट बिना किसी हस्तक्षेप के किसी सर्वर पर सीधे बातचीत नहीं करता है, यह आमतौर पर छोटे वातावरण (50 से कम उपयोगकर्ताओं) में उपयोग किया जाता है।  Two tier Architecture में, User interface उपयोगकर्ता के डेस्कटॉप वातावरण पर रखा जाता है और डेटाबेस प्रबंधन सिस्टम सेवाएं आमतौर पर एक सर्वर में होती हैं जो एक से अधिक शक्तिशाली मशीन होती है जो कई क्लाइंट्स को सेवाएं प्रदान करती है। सूचना प्रोसेस user system interface environment और database management server environment के बीच विभाजित है।

Three tier Architecture

Two tier Architecture की कमी को दूर करने के लिए Three tier Architecture को बनाया गया हैं| Three tier Architecture में, उपयोगकर्ता सिस्टम इंटरफ़ेस क्लाइंट पर्यावरण और डेटाबेस प्रबंधन सर्वर वातावरण के बीच एक मिडलवेयर का उपयोग किया जाता है। इन मिडलवेयर को विभिन्न तरीकों से कार्यान्वित किया जाता है जैसे कि लेनदेन प्रसंस्करण मॉनीटर, संदेश सर्वर या एप्लिकेशन सर्वर। मिडलवेयर क्यूइंग, एप्लिकेशन निष्पादन और डेटाबेस स्टेजिंग का कार्य करता है। इसके अलावा मिडलवेयर प्रगति पर काम के लिए शेड्यूलिंग और प्राथमिकता जोड़ता है। Three tier client/ server Architecture का उपयोग बड़ी संख्या में उपयोगकर्ताओं के प्रदर्शन में सुधार के लिए किया जाता है और two tier Architecture की तुलना में लचीलापन में भी सुधार करता है।

Advantages of Client Server Architecture (क्लाइंट सर्वर आर्किटेक्चर के लाभ)

  • प्रत्येक क्लाइंट को टर्मिनल मोड या प्रोसेसर में लॉग इन करने की आवश्यकता को समाप्त करने के लिए डेस्कटॉप इंटरफ़ेस के माध्यम से कॉर्पोरेट जानकारी तक पहुंचने का अवसर दिया जाता है। 
  • क्लाइंट-सर्वर मॉडल के लिए उपयोग किया जाने वाला एप्लिकेशन हार्डवेयर प्लेटफॉर्म या हकदार सॉफ़्टवेयर (ऑपरेटिंग सिस्टम सॉफ़्टवेयर) की तकनीकी पृष्ठभूमि के बावजूद बनाया गया है जो कंप्यूटिंग पर्यावरण प्रदान करता है, जिससे उपयोगकर्ताओं को क्लाइंट्स और सर्वर (डेटाबेस, एप्लिकेशन और संचार सेवाओं) की सेवाएं प्राप्त करने के लिए मजबूर किया जाता है। 
  • क्लाइंट-सर्वर उपयोगकर्ता प्रोसेसर के स्थान या तकनीक के बावजूद सीधे सिस्टम में लॉग इन कर सकते हैं। 
  • क्लाइंट-सर्वर आर्किटेक्चर को नेटवर्क में एकीकृत स्वतंत्र कंप्यूटरों के बीच फैलाने वाली जिम्मेदारियों का प्रतिनिधित्व करने वाला मॉडल वितरित किया जाता है। इसलिए, क्लाइंट को अप्रभावित बनाते समय सर्वर को प्रतिस्थापित करना, मरम्मत करना, अपग्रेड करना और स्थानांतरित करना आसान है। इस अनजान परिवर्तन को Encapsulation के रूप में जाना जाता है। 
  • सर्वरों के पास बेहतर नियंत्रण पहुंच और संसाधन हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि केवल अधिकृत क्लाइंट डेटा तक पहुंच या कुशलतापूर्वक उपयोग कर सकें और सर्वर अपडेट प्रभावी ढंग से प्रशासित होते हैं। 
  • फ्रंट एंड टास्क और बैक-एंड टास्क में प्रोसेसर की गति, मेमोरी, डिस्क की गति और क्षमताओं, और इनपुट / आउटपुट डिवाइस जैसे कंप्यूटिंग के लिए मौलिक रूप से अलग-अलग आवश्यकताएं हैं। 
  • क्लाइंट-सर्वर सिस्टम की एक महत्वपूर्ण विशेषता स्केलेबिलिटी है। उन्हें क्षैतिज या लंबवत स्केल किया जा सकता है। क्षैतिज स्केलिंग का मतलब केवल कुछ मामूली प्रदर्शन प्रभाव के साथ क्लाइंट वर्कस्टेशंस को जोड़ना या निकालना है। लंबवत स्केलिंग का मतलब है एक बड़ी और तेज़ सर्वर मशीन या मल्टीसेवर में माइग्रेट करना।